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।। सियावर रामचंद्र की जय ।।

हनुमान चालीसा हिंदी अनुवाद सहित

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जय श्री राम मित्रो,
आप सभी ने हनुमान चालीसा जी का पाठ कभी न कभी किया होगा और बहुत से भाई प्रतिदिन करते हैं पर क्या आप हनुमान चालीसा जी के चौपाइयों के अर्थ से परिचित हैं ? अगर नहीं तो आज हम प्रत्येक चौपाई का उसके अर्थ के साथ भाव समझने वाले हैं तो चलिए प्रारंभ करते हैं

श्रीगुरु चरन सरोज रज, निज मनु मुकुरु सुधारि।
बरनऊं रघुबर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि।। 

भावार्थ – तुलसीदास जी हनुमान चालीसा जी का प्रारम्भ अपने गुरु के श्री चरणों में प्रणाम करते हुए करते हैं वो कहते हैं कि श्री गुरु महाराज जी के चरण कमलों की धूलि से अपने मन रुपी दर्पण को शुध्ह करके भगवान श्री राम जी के निर्मल यश का वर्णन करता हूँ जो भक्तों को चारों फल प्रदान करने वाले हैं।

शब्द –

सरोज – कमल
मुकुरु – दर्पण/शीशा
बरनऊँ – वर्णन करता हूँ
बिमल – निर्मल/मलरहित

बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन-कुमार।
बल बुद्धि बिद्या देहु मोहिं, हरहु कलेस बिकार।।

भावार्थ – हे पवन कुमार श्री हनुमान जी महाराज मैं अपने तन/शरीर को बल,बुध्ही से हीन समझकर आपका सुमिरन/स्मरण कर रहा हूँ । आप मुझे बल,बुध्ही,विद्या प्रदान करके मेरे समस्त दोषों एवं विकारों को दूर कीजिये।

शब्द –
तनु – तन/शरीर
सुमिरौं – स्मरण करता हूँ
हरहु – हरिये/दूर कीजिये

चौपाई 

जय हनुमान ज्ञान गुन सागर।
जय कपीस तिहुं लोक उजागर।।

भावार्थ – हे हनुमान जी महाराज आप ज्ञान और गुणों के सागर हैं आपकी जय हो । तीनों लोकों में जिनका यश प्रकाशित है ऐसे कपीस श्री हनुमान जी महाराज आपकी जय हो ।

शब्द –
उजागर – प्रकाशित

रामदूत अतुलित बल धामा।
अंजनि-पुत्र पवनसुत नामा।।

भावार्थ – आप रामजी के दूत और असीमित बलवान हैं। आप अंजनी मैया के पुत्र हैं और आपको पवनसुत कहा जाता है।

शब्द –
अतुलित – असीमित

महाबीर बिक्रम बजरंगी।
कुमति निवार सुमति के संगी।।

भावार्थ – हे महावीर हनुमान जी आप अत्यंत वीर एवं वज्र के सामान मजबूत शरीर वाले हैं। आप दुर्बुध्ही यानी गलत सोच एवं विचारों को दूर करते हैं और अच्छे विचार/सद्विचार वालों के साथी-संगी हैं।

शब्द –
बिक्रम – वीर
बजरंगी – वज्र के समान शरीर वाला
कुमति – बुरी सोच/विचार
निवार – दूर करना
सुमति – सद्विचार

कंचन बरन बिराज सुबेसा।
कानन कुंडल कुंचित केसा।।

भावार्थ- हे सोने के रंग के समान शरीर वाले हनुमान जी महाराज आप सुन्दर वस्त्र एवं आभूषणों, कानों में कुंडल एवं घुँघराले बालों से सुशोभित हैं।

शब्द –
कंचन – सोना
बरन -रंग
बिराज – विराजमान हैं/सुशोभित हैं
सुबेसा – सुन्दर वस्त्र आभूषणों से
कुंचित – घुँघराला

हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजै।
कांधे मूंज जनेऊ साजै।

भावार्थ – हे हनुमान जी महाराज आपके हाथ में वज्र यानी गदा और ध्वजा विराजमान है। आपके कंधे पे मूंज का जनेऊ सुशोभित है।

शब्द –
बज्र – गदा

संकर सुवन केसरीनंदन।
तेज प्रताप महा जग बन्दन।।

भावार्थ – हे भगवान शंकर के अंश (अवतार) एवं केसरी के पुत्र आपके महान पराक्रम एवं वीरता की सम्पूर्ण जगत में वंदना होती है।

शब्द –
सुवन – अंश
प्रताप – वीरता

विद्यावान गुनी अति चातुर।
राम काज करिबे को आतुर।।

भावार्थ – हे हनुमान जी महाराज आप समस्त विद्याओं में निपुण, अत्यंत गुणवान एवं चतुर हैं। आप भगवान श्री राम के कार्य पूर्ण करने के लिए सदैव उत्सुक रहते हैं।

शब्द –
गुनी – गुणवान

प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया।
राम लखन सीता मन बसिया।।

भावार्थ – हे हनुमान जी महाराज आप भगवान श्री राम जी की कथा सुनने में आप बहुत आनंदित होते हैं। भगवान श्रीराम, लक्ष्मण और मैया सीता सदैव आपके ह्रदय में निवास करती हैं।

शब्द –
चरित्र – कथा
रसिया – रस लेना/आन्दित होता

सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा।
बिकट रूप धरि लंक जरावा।।

भावार्थ – हे हनुमान जी महाराज आपने अत्यंत सूक्ष्म यानी बहुत छोटा रूप बनाके मैया सीता को दिखाया और फिर विशाल रूप धरके लंका को जलाया।

शब्द –
सूक्ष्म – बहुत छोटा
बिकट – विशाल/बहुत बड़ा

भीम रूप धरि असुर संहारे।
रामचंद्र के काज संवारे।।

भावार्थ – हे हनुमान जी महाराज आपने बहुत भयंकर रूप धारण करके राक्षसों को मारा और प्रभु श्री रामचन्द्र जी के कार्यों को संवारा यानी पूरा किया।

शब्द –
भीम – भीषण/भयंकर
धरि – धारण करके
संवारे – पूरा किया/संपन्न किया

लाय सजीवन लखन जियाये।
श्रीरघुबीर हरषि उर लाये।।

भावार्थ – हे हनुमान जी महाराज लक्ष्मण जी को शक्ति लगने पर जब उनके प्राणों पर संकट आया तब आपने संजीवनी बूटी लाकर उनके प्राणों की रक्षा करी। तब भगवान श्री रामचन्द्र जी ने प्रसन्न होकर आपको ह्रदय से लगा लिया।

शब्द –
हरषि – प्रसन्न होकर
उर – ह्रदय/छाती

रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई।
तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई।।

भावार्थ – तब भगवान श्री राम ने आपकी बहुत प्रशंसा करी और कहा कि तुम मेरे भरत के सामान ही प्रिय भाई हो।

सहस बदन तुम्हरो जस गावैं।
अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं।।

भावार्थ – हे हनुमान जी महाराज हज़ार मुखों वाले भगवान शेषनाग जी आपके यश का गुणगान करें ऐसा कहकर भगवान श्री राम ने आपको गले से लगा लिया

शब्द –
सहस – हज़ार
बदन – मुख
श्रीपति – भगवान राम

सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा।
नारद सारद सहित अहीसा।।
जम कुबेर दिगपाल जहां ते।
कबि कोबिद कहि सके कहां ते।।

भावार्थ – सनकादिक ऋषि(श्री सनक,श्री सनातन,श्री सनन्दन, श्री सनत्कुमार), ब्रह्मा,विष्णु एवं महेश आदि देवगण और जितने भी ऋषि मुनि हैं उनके साथ ही नारद जी, सरस्वती जी, शेषनाग जी, यमराज, कुबेर, समस्त दिगपाल भी मिलकर जब आपके यश का वर्णन करने में असमर्थ हैं तो फिर कोई भी कवि या प्रकांड विद्वान आपके यश का वर्णन कैसे कर सकता है।

शब्द –
सनकादिक – सनकादिक ऋषि(श्री सनक,श्री सनातन,श्री सनन्दन, श्री सनत्कुमार)
मुनीसा – समस्त मुनि
सारद – शारदा यानी माँ सरस्वती
अहीसा – भगवान शेषनाग
दिगपाल – दशों दिशाओं के रक्षक
कोबिद – प्रकांड विद्वान्

तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा।
राम मिलाय राज पद दीन्हा।।

भावार्थ – हे हनुमान जी महाराज आपने वानर राज सुग्रीव पर बड़ा ही उपकार किया आपने उन्हें प्रभु श्री रामचन्द्र जी से मिलावाया और फिर राम जी ने बाली का वध कर सुग्रीव को किष्किन्धा का राजपद दिया।

तुम्हरो मंत्र बिभीषन माना।
लंकेस्वर भए सब जग जाना।।

भावार्थ – हे हनुमान जी महाराज आपका मंत्र यानी आपका परामर्श विभीषण जी ने माना जिसके कारण वो लंका के राजा हुए, लंकेश्वर हुए यह सारा संसार जनता है। (जब हनुमान जी लंका गये थे तब वहाँ उनकी भेंट विभीषण जी से हुई थी तब हनुमान जी ने ही विभीषण जी को प्रभु श्री राम जी के शरणागत होने का परामर्श/मंत्र दिया था)

जुग सहस्र जोजन पर भानू।
लील्यो ताहि मधुर फल जानू।।

भावार्थ – हे हनुमान जी महाराज आपने एक युग सहस्त्र योजन की दूरी पर स्थित सूर्य को भी एक सुन्दर फल जानकार निगल लिया

प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं।
जलधि लांघि गये अचरज नाहीं।।

भावार्थ – हे हनुमान जी महाराज इसमें कोई अचरज की बात नहीं है कि आप प्रभु श्री राम की दी हुई अंगूठी को मुख में रखकर विशाल महासागर को बड़ी ही आसानी से लांघ गये । ध्यान देने योग्य बात यह है कि यहाँ गोस्वामी जी रामनाम की महिमा को भी उजागर कर रहे हैं कि जिस प्रकार हनुमान जी रामनाम अंकित अंगूठी को मुंह में रखकर विशाल महासागर लाँघ गये उसी प्रकार जो मनुष्य प्रभु श्रीराम का नाम अपने मुंह में रखता है वो इस संसार रुपी अगाध सागर को भी बड़ी आसानी से पार कर जाता है।

शब्द –
मुद्रिका – अंगूठी
जलधि – समुद्र

दुर्गम काज जगत के जेते।
सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते।।

भावार्थ – हे हनुमान जी महाराज अगर आपकी कृपा हो तो संसार के जितने भी कठिनतम कार्य हैं वो सब बड़ी ही सुगमता से संपन्न हो जाते हैं।

राम दुआरे तुम रखवारे।
होत न आज्ञा बिनु पैसारे।।

भावार्थ – हे हनुमान जी महाराज आप भगवान श्री राम के द्वार के रखवाले हैं आपकी आज्ञा के बिना कोई भी प्रभु श्री राम के दरबार में प्रवेश नहीं कर सकता। (यहाँ गोस्वामी जी का तात्पर्य यह है कि हनुमान जी की कृपा के बिना कोई भी भगवान राम के दर्शन और भक्ति नहीं पा सकता )

शब्द –
पैसारे – प्रवेश

सब सुख लहै तुम्हारी सरना।
तुम रक्षक काहू को डर ना।।

भावार्थ – हे हनुमान जी जो भी आपकी शरण में आते हैं उन्हें सभी प्रकार के सुख प्राप्त हो जाते हैं । जब आप रक्षक हैं तो फिर किसी वस्तु या किसी व्यक्ति का कोई भी डर नहीं रह जाता।

आपन तेज सम्हारो आपै।
तीनों लोक हांक तें कांपै।।

भावार्थ – हे हनुमान जी महाराज अपने तेज़ को केवल आप स्वयं ही संभाल सकते हैं । आपकी एक हुंकार मात्र से तीनों लोक कांपना शुरू कर देते हैं ।

शब्द –
तेज़ – पराक्रम,प्रताप
हांक – हुंकार

भूत पिसाच निकट नहिं आवै।
महाबीर जब नाम सुनावै।।

भावार्थ – हे हनुमान जी महाराज आपके नाम का स्मरण करने से कोई भी भूत-प्रेत या किसी भी प्रकार का भय पास नहीं फटकता।

नासै रोग हरै सब पीरा।
जपत निरंतर हनुमत बीरा।।

भावार्थ – हे हनुमान जी महाराज आपके नाम का निरंतर जाप करने से सभी प्रकार के रोग-दोष एवं कष्टों के नाश हो जाता है।

संकट तें हनुमान छुड़ावै।
मन क्रम बचन ध्यान जो लावै।।

भावार्थ – हे हनुमान जी महाराज जो कोई भी मन,कर्म और वाणी द्वारा आपका ध्यान करे तो आप उसे सभी प्रकार के संकट और वेदनाओं से छुटकारा दिलाते हो।

शब्द –
क्रम – कर्म में
बचन – वाणी में

सब पर राम तपस्वी राजा।
तिन के काज सकल तुम साजा।।

भावार्थ – हे हनुमान जी तपस्वी राजा श्री रामचन्द्रजी सभी में श्रेष्ठ हैं। और उनके समस्त कार्यों को आपने बड़ी ही सहजता से पूरा किया।

शब्द –
सकल – सब/समस्त

और मनोरथ जो कोई लावै।
सोइ अमित जीवन फल पावै।।

भावार्थ – हे हनुमान जी महाराज जो भी आपके पास कोई कामना लेके आता है उसे भी आप जीवन का सबसे उच्च कभी न नष्ट होने वाला फल देते हैं। (अर्थात हनुमान जी उसे भगवान श्री सीताराम जी के श्री चरणों की भक्ति प्रदान करते हैं जो कभी न नष्ट होने वाली एवं भवसागर से पार लगाने वाली है।)

शब्द –
मनोरथ – इच्छा/कामना
अमित – अविनाशी/असीम

चारों जुग परताप तुम्हारा।
है परसिद्ध जगत उजियारा।।

भावर्थ – हे हनुमान जी महाराज चारों युगों (सतयुग,त्रेतायुग, द्वापर और कलियुग) में आपका वैभव व्याप्त है। आपकी महिमा सम्पूर्ण जगत में प्रसिद्ध है।

साधु-संत के तुम रखवारे।
असुर निकंदन राम दुलारे।।

भावार्थ – हे प्रभु श्रीराम के दुलारे हनुमान जी आप ऋषि-मुनियों के रक्षक और दुष्टों का नाश करने वाले हैं।

शब्द –
निकंदन – नाश/संहार

अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता।
अस बर दीन जानकी माता।।

भावार्थ – हे हनुमान जी महाराज आपको मईया जानकी से ऐसा वर प्राप्त है जिससे आप जिसे चाहें आठ सिद्धियाँ(अणिमा, महिमा,लघिमा,गरिमा,प्राप्ति,प्राकाम्य, इशित्व और वशित्व) और नौ निधियां(पद्म निधि, महापद्म निधि, नील निधि, मुकुंद निधि, नंद निधि, मकर निधि, कच्छप निधि, शंख निधि और खर्व निधि) प्रदान कर सकते।

राम रसायन तुम्हरे पासा।
सदा रहो रघुपति के दासा।।

भावार्थ – हे हनुमान जी महाराज आप सदैव प्रभु श्री राम की भक्ति कर रहे हैं आपके पास राम नाम रुपी रसायन है अर्थात हनुमान जी के पास राम जी की भक्ति रुपी औषधि है।

तुम्हरे भजन राम को पावै।
जनम-जनम के दुख बिसरावै।।

भावार्थ – हे हनुमान जी महाराज जो कोई भी आपको भजते हैं आपका भजन करते हैं उनको प्रभु श्री राम जी की भक्ति प्राप्त हो जाती है एवं उनके जन्म-जन्मान्तर के दुःख,पीड़ा समाप्त हो जाती है।

अन्तकाल रघुबर पुर जाई।
जहां जन्म हरि-भक्त कहाई।।

भावार्थ – हे हनुमान जी ऐसे भक्त अंत समय में प्रभु श्री राम के धाम (साकेत धाम) जाते हैं और अगर फिर उन्हें जन्म लेना भी पड़ा तो वो जहाँ भी जन्म लेते हैं वहाँ श्री राम भक्त के रूप में ही प्रसिद्धी पायेंगे।

और देवता चित्त न धरई।
हनुमत सेइ सर्ब सुख करई।।

भावार्थ – हे हनुमान जी अगर कोई आपका भक्त है तो उसे किसी अन्य देवता को ह्रदय में धारण करने की कोई आवश्यकता नहीं है। आपकी कृपा/भक्ति ही जीवन में सब सुख प्रदान करने में समर्थ है।

संकट कटै मिटै सब पीरा।
जो सुमिरै हनुमत बलबीरा।।

भावार्थ – हे हनुमान जी आपका निरंतर सुमिरन करने से जीवन के सब संकट दूर हो जाते हैं और पीडाएं समाप्त हो जाती हैं।

शब्द –
सुमिरै – स्मरण करना

जै जै जै हनुमान गोसाईं।
कृपा करहु गुरुदेव की नाईं।।

भावार्थ – हे इन्द्रियों के स्वामी हनुमान जी आपकी (तीनों लोकों में , तीनों कालों में, तीनों गुणों में ) जय हो ! जय हो ! जय हो ! आप श्री गुरुदेव की भांति कृपा कीजिये ।

शब्द –
गोसाईं – इन्द्रियों का स्वामी / जितेन्द्रिय

जो सत बार पाठ कर कोई।
छूटहि बंदि महा सुख होई।।

भावार्थ – जो भी कोई पूरे ह्रदय से हनुमान चालीसा का पाठ करता है वह सारे बंधनों से छुटकारा पाकर महासुख को प्राप्त होता है।

शब्द –
बंदि – बंधन

जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा।
होय सिद्धि साखी गौरीसा।।

भावार्थ – जो भी हनुमान चालीसा का पाठ पूरे भाव एवं प्रेम से करेगा उसके सभी मनोरथ पूर्ण होंगे। स्वयं भगवान शंकर इसके साक्षी हैं।

शब्द –
गौरीसा – भगवान शंकर

तुलसीदास सदा हरि चेरा।
कीजै नाथ हृदय मंह डेरा।।

भावार्थ – हे हनुमान जी ! तुलसीदास तो सदा से ही भगवान श्री राम का दास है और ऐसा जानकर आप मेरे ह्रदय में आकर डेरा कीजिये अर्थात निवास कीजिये।

दोहा –

पवन तनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप।
राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप।।

भावार्थ – हे पवन पुत्र आप संकटों का निवारण करने वाले हैं। आप मंगल करने वाले हैं। आप राम लक्षमण और सीता जी के साथ मेरे ह्रदय में निवास कीजिये।

।। सियावर रामचंद्र की जय ।।
।। श्री हनुमान जी महाराज की जय।।